#JaiYoddhey
यूनियनिस्ट जैक बनाम भगवा ध्वज !
एक दो खास जानकारी मैं अपने यूनियनिस्ट मिशन के यौद्धेय साथियों के साथ शेयर करना चाहता हूँ ,जिसकी जानकारी बहुत कम लोगों को है, यहां तक कि सर छोटूराम अथवा यूनियनिस्ट पार्टी पर किताबें लिखने वाले भी यह जानकारी नहीं रखते कि आखिर सर छोटूराम साब की पार्टी का झंडा कौन सा था और उनकी पार्टी किस सिम्बल पर इलेक्शन लड़ती थी।
यहां इस पोस्ट में जो उगते सूरज का झंडा है ,यह झंडा ही यूनियनिस्ट पार्टी का झंडा हुआ करता था ।
गौर करें कि इस झंडे में लाल, सफेद और नीला, तीन रंग हैं।
दूसरी तरफ जो दूसरा झंडा इसी पोस्ट में सलंग्न है, वह ब्रिटेन का झंडा यूनियन जैक है, इस यूनियन जैक में भी तीन ही रंग हैं- लाल, सफेद और नीला।
यूनियन जैक में और यूनियनिस्ट पार्टी के झंडे के रंगों में समानता कोई संयोग मात्र नहीं है, बल्कि जानबूझ कर , विचारविमर्श करके ही सर छोटूराम जी की पार्टी के झंडे में ये तीन रंग रखे गए थे, जिसका कारण था कि हम यूनियनिस्ट अंग्रेजी हुकुमत में गुलाम नहीं, बल्कि सम्मानजनक पार्टनर थे। अतः यह रंगों का एक जैसा होना इस पार्टनरशिप पर मुहर थी।
मैं यूनियनिस्ट पार्टी के झंडे को ब्रिटेन के यूनियन जैक की तर्ज पर यूनियनिस्ट जैक कहता हूं।
भविष्य में हमारे इस महान यूनियनिस्ट जैक की सबसे बड़ी टक्कर ,संवैधानिक तरीके अपनाते हुए, भगवा ध्वज से होनी है, जिसकी तैयारी हम कर रहे हैं ; यह हमारी सामूहिक मेहनत पर निर्भर करेगा कि कौन सा झंडा इस मुल्क में बुलंद होगा ।
दूसरी जानकारी यह है कि 1947 से पहले भारत के प्रोविन्सेस (राज्यों) में जो इलेक्शन हुआ करते थे, उन चुनावों में पार्टियां तो थी ,परंतु सिंबल नहीं होते थे। जैसे आजकल बीजेपी का चुनाव चिन्ह कमल का फूल है, कांग्रेस का पंजा है, बसपा का हाथी है ,इस तरह के सिंबल पर इलेक्शन उस जमाने में नहीं हुआ करते थे।
बल्कि, उस जमाने में सिंबल की बजाय पोलिटिकल पार्टीज को कलर (रंग) दिए जाते थे, जैसे किसी पार्टी को हरा रंग मिल गया, किसी को गुलाबी मिल गया, किसी को सन्तरिया मिल गया, आदि।
आपको जानकर अच्छा लगेगा कि सर छोटूराम और सर फजले हुसैन साब की पार्टी का चुनावी रंग नीला था ,जिस पर हुई रायशुमारी से यौद्धेय, यूनियनिस्ट पार्टी की सरकार बनाते थे।
बाद में यही नीला रंग भारत की पूरी बहुजन मूवमेंट का रंग बन गया। असल में साहब कांसीराम जी भी पंजाब से थे ,जो यूनियनिस्ट पार्टी के इतिहास और इस रंग से बखूबी वाकिफ थे।
आजकल जो कुछ नासमझ जाटों के लड़के ,मंडी फंडि की बहकाई में आकर मूलनिवासियों को अथवा दलित समाज के संघर्षशील लोगों को सोशल मीडिया पर "नीलटे नीलटे" कहकर मजाक उड़ाते हैं, तो इन हमारे बहके हुए जाट भाइयों को मैं बताना चाहता हूं कि इन नीलटों से पहले हम नीलटे बने थे।
दीनबंधु सर छोटूराम जी को तो यह नीला रंग इतना पसंद था कि उनकी रोहतक स्थित कोठी का रंग नीला ही है, जिसे नीली कोठी भी कहा जाता है। यह नीली कोठी 1928 में बनी थी और आज भी अपनी भव्यता के साथ खड़ी है।
आज इतना ही।
-मनोज दूहन
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